क्या सच में हम अपने भाग्य के गुलाम हैं?
अभी कैंसर में सूरज, चंद्रमा और मरकरी का जमावड़ा है। ये भावुक हलचल हमारे भीतर दबे उन सवालों को जगा रही है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। मेरे मन में एक अजीब बात चल रही है। क्या सच में हमारे पुराने कर्मों का कोई हिसाब-किताब होता है जिसे हम 'प्रारब्ध' कहते हैं? पश्चिमी ज्योतिष तो ट्रांजिट्स और साइकोलॉजी की बात करता है, लेकिन क्या वो 'डेस्टिनी' का पूरा सच है? अगर हम सब कुछ ग्रहों की चाल से ही तय कर रहे हैं, तो फिर ये बेचैनी क्यों है? क्या हमने कभी सोचा है कि क्या वाकई हम बदल सकते हैं, या हम बस एक स्क्रिप्ट जी रहे हैं? मैंने SkyToday ऐप पर देखा कि राहु-केतु का एक्सिस कैसे हमारे अनसुलझे डर को छू रहा है। ये कोई रैंडम संयोग नहीं लगता। मुझे ये बताओ, क्या तुम्हें भी लगता है कि कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं? या शायद हम बस खुद को तसल्ली देने के लिए ये सब ढूंढते हैं। सोचो जरा, तुम क्या सोचते हो?
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