क्या हम सिर्फ अपने पूर्वजों की छाया हैं?
आज चंद्रमा आश्लेषा नक्षत्र के अंतिम चरण में है। ये गंडांत का समय है। केतु मघा में बैठा है, बिल्कुल हमारे पूर्वजों के द्वार पर। मेरे मन में एक अजीब सी उलझन है। हम जो भी निर्णय लेते हैं, क्या वो वाकई हमारे हैं? या फिर ये हमारे पिछले जन्मों के अधूरी रह गए वादों का नतीजा हैं? शनि मीन राशि में रेवती नक्षत्र पर है, सब कुछ विसर्जन की ओर जा रहा है। राहु शतभिषा में है, ये कोलाहल और धुंध का संगम है। जब ग्रह ऐसे बैठे हों, तो लगता है कि हम अपनी नियति के कैदी हैं। आप सबको क्या लगता है? क्या हम राहु-केतु के इस अक्ष में सिर्फ अपने कर्मों का हिसाब चुका रहे हैं? या फिर स्वतंत्र इच्छा नाम की कोई चीज़ सच में बची है? कभी-कभी तो लगता है कि ये चक्र कभी नहीं रुकता। अगर आप भी अपनी कुंडली के इन छिपे हुए ऋणों को समझना चाह रहे हैं, तो 'Vyom' ऐप पर एक बार अपनी स्थिति देख लेना। शायद वहां कुछ स्पष्ट हो जाए। खैर, नियति का खेल तो चलता ही रहेगा। पर क्या आप इस खेल के खिलाड़ी हैं या सिर्फ मोहरा?
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