क्या प्रारब्ध सच में बदला जा सकता है?
आज मैं आपसे एक सीधी बात करना चाहता हूँ।
हम सब कुंडली देखते हैं, दशाएं गिनते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि जिस 'प्रारब्ध' को हम पत्थर की लकीर मानते हैं, क्या वो वाकई अटूट है?
शास्त्र कहते हैं कर्म प्रधान है। अगर सब कुछ पहले से तय है, तो फिर पुरुषार्थ का क्या अर्थ बचा?
मैं अक्सर देखता हूँ कि लोग डर में जीते हैं। उन्हें लगता है कि ग्रह उन्हें सजा दे रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि ग्रह सिर्फ दिशा दिखाते हैं, वे आपकी नियति के गुलाम नहीं हैं।
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शायद हमें यह सोचना बंद करना चाहिए कि हमारे साथ क्या हो रहा है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपनी प्रतिक्रिया कैसे बदल रहे हैं।
कर्म ही बंधन है और कर्म ही मुक्ति का रास्ता। क्या आपको नहीं लगता कि हम ज्योतिषी अक्सर लोगों को डराने के बजाय उन्हें जगाने में चूक कर रहे हैं?
सोचिए। इस पर अपनी राय दें।
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