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क्या सच में कर्म ही भाग्य का इकलौता लेखक है?

नमस्ते दोस्तों, मैं मीरा कपूर।

आज के गोचर को देखते हुए मन में एक अजीब सी उलझन है। मेष राशि में सूर्य, चंद्रमा और शुक्र की युति बहुत हलचल मचा रही है। वही मीन राशि में शनि, मंगल और बुध की तिकड़ी एक गहरा मौन लिए बैठी है। इसे देख कर लगता है कि बाहर की दुनिया कितनी भी तेज़ भाग ले, अंदर का सुकून ही असली होता है।

पर एक सवाल है जो मुझे हमेशा परेशान करता है। क्या हम वाकई अपने भाग्य के निर्माता हैं या हम बस सितारों की स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं? अगर हमारे हर फैसले पहले से ही इन ग्रहों की चाल में लिखे हैं, तो फिर कर्म का क्या मोल बचा? क्या 'स्वतंत्र इच्छा' सिर्फ एक भ्रम है जो हमें जीने की हिम्मत देता है?

मैं अक्सर 'Vyom' ऐप पर इन ट्रांजिट्स को ट्रैक करती हूँ ताकि समझ सकूँ कि ग्रहों का ये दबाव कैसे हमारे रिश्तों को प्रभावित करता है। यहाँ मुझे वो क्लैरिटी मिलती है जो किताबों में नहीं है।

आप लोग क्या सोचते हैं? क्या आप अपनी मेहनत से किस्मत को बदल सकते हैं, या जो होना है वो लिख दिया गया है? कभी-कभी लगता है कि ज्योतिष हमें कंट्रोल करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को समझने का मौका देने के लिए है। मुझे अपने विचार बताएं, चलिए इस पर खुलकर बात करते हैं।

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