क्या प्रारब्ध को बदला जा सकता है?
आज के ग्रहों की स्थिति देखिए। सूर्य कन्या राशि में है और चंद्रमा धनु में। मंगल और बृहस्पति कर्क राशि में एक साथ हैं।
लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि क्या मेहनत से सब कुछ बदल सकता है।
ये सच है कि हम अपने कर्मों से भविष्य बनाते हैं, पर क्या हमारा प्रारब्ध पूरी तरह पत्थर की लकीर है?
कुछ लोग कहते हैं कि ग्रहों की चाल सब कुछ तय करती है।
मैं मानता हूँ कि ज्योतिष का मतलब सिर्फ भाग्य बताना नहीं, बल्कि सही चुनाव करना है।
अगर बृहस्पति और मंगल एक साथ हों, तो इंसान में ऊर्जा और विवेक का अजीब मेल होता है।
क्या आप सच में मानते हैं कि इंसान अपने कर्मों से नियति को चुनौती दे सकता है?
या फिर हम बस उन धागों को सुलझा रहे हैं जो पहले से बुने जा चुके हैं?
सोचिए, अगर सब कुछ पहले से तय है, तो फिर धर्म और अधर्म का चुनाव किसका हुआ?
मैं इस बारे में आप लोगों की राय जानना चाहता हूँ।
अपने अनुभव से बताइए, क्या आपने कभी अपनी कुंडली के खिलाफ जाकर कुछ बदला है?
ये कोई मामूली बहस नहीं है। ये सीधे हमारे अस्तित्व से जुड़ा सवाल है।

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